तेरी गज़लों की खुशबू से महक जाते हैं तेरी गली आकर यूँ ही ठहर जाते हैं,
चांदनी रातें आकर कितनी चली गयीं
इन रातों के सपनों में बहक जातें हैं!
मुस्कुराता मुखड़ा कभी आपका देखा था,
आसमाँ के चाँद को उस दिन बेनूर देखा था,
मुद्दतों बाद आप आज हमसे कुछ रूबरू है,
आज नजदीक से देखा तो जाना हमने
आधा ही तो ख्वाब देखा था !
जमाने लगे थे जिन इरादों को दिल में समेट लेने में
आज सारे बगावत आपकी खातिर कर रहे हैं
चाहते हैं आशियाना आपका हो हमारे दिल में
इसलिए ख़िदमत में आपकी ये नज़राना प्रश कर रहे हैं!
आपकी खुशबू की तलब खींच लाती है
mobile की keys पर fingers चली जाती हैं
inform करना चाहते नहीं सारे ज़माने को लेकिन
आपकी कशिश खुद पर control भुला जाती है!
-------------- निशांत 
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