Friday, 6 May 2011

mehfil

बात बाकी थी कि तुम उठ गए हम कह न सके तुम खो गए|. महकती जुल्फों की उस छाओं में उनमे खोने की हमारी कई ख्वाहिशें उन होठों को छूने की वो हसरतें , तेरी निगाहों की मस्ती की वो बारिशें . काश वो उठ के न जाते तो शायद .... इक दिन ये हसरतें हम पा जाते |. बात बाकी थी ...... वादे भी नहीं किये थे तुमसे वादे भी नहीं लिए थे तुमसे इज़हार -ए-हाल करे क्या तुमसे तबियत इसके मुक़म्मल नहीं है ; दीदार -ए -सूरत करा जाते तो शायद ........ बेफिक्र , उसका शहर हम छोड़ आते |. बात बाकी थी ........... नज़रें हुस्न तेरा अब कहाँ पाएंगी काली छाया क्या गोरी हो पाएगी गिरह सारे तम्हारे टूटे हैं हमसे याद -बंधन को दूरी तोड़ नहीं पायेगी . मस्जिद में फूल चढ़ाये नहीं जाते या शायद लहू और फूल में अंतर समझाये जाते |. बात बाकी थी .......

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