अवमानना
कालसर्प भी जिसे कभी ना निगल पाया,
उस विकल अभिव्यक्ति की मैं गर्जना हूँ ,
पूर्णता को चिर आकांक्षी कल्पना हूँ ।
व्यथित कुंठित जन प्रताड़ित
रही अगणित अस्त उदय तक,
मन मसोसकर चली ना जाने
मन मसोसकर चली ना जाने
कितने ही मैं मलिन पथों पर,
शोडित की धरा से सिंचित किया मार्ग के हर कंटक को;
किसी शूल पथ पर कोमल अभिभावना हूँ।
शोडित की धरा से सिंचित किया मार्ग के हर कंटक को;
किसी शूल पथ पर कोमल अभिभावना हूँ।
पूर्णता को चिर आकांक्षी कल्पना हूँ..........|
रही कोई परिस्थिति प्रहरी निरंतर ,
कोई घटना मेरी वाणी से चिपकी मानो,
किसी दृश्य ने मुझ पर तिर्यक दृष्टि डाली,
दर्शनों के अंधेपन को ललकारता हूँ।
कोई घटना मेरी वाणी से चिपकी मानो,
किसी दृश्य ने मुझ पर तिर्यक दृष्टि डाली,
दर्शनों के अंधेपन को ललकारता हूँ।
पूर्णता को चिर आकांक्षी कल्पना हूँ..........|
बहुत घेरा परछायिओं ने बीते समय की,
उनमे से ही थी कई गाथाएं परिचित,
एक किस्से ने मुझे स्वयं की बात बोली-
राज आश्रित किसी कवि की भावना हूँ ।
पूर्णता को चिर आकांक्षी कल्पना हूँ..........|
कुछ वासनाओ की कहानी मिलने आई,
यत्र -तत्र हर अंश जैसे करने आई,
जो नही आया उसके भय ने घेरा ,
भयभीत भीतर के रुदन की कंपना हूँ...।
जो नही आया उसके भय ने घेरा ,
भयभीत भीतर के रुदन की कंपना हूँ...।
पूर्णता को चिर आकांक्षी कल्पना हूँ..........।
प्रस्तरों-पावन पहाड़ी-पर्वतो में,
नदी-कुंड-समुद्र-ताल और पोखरों में,
मानो जिसे भी भक्ति-भुक्ति या मुक्ति -साधन ,
इतर उससे शांति की मै कामना हूँ ;
एक अखंडित स्वयं मानता , अन्य की अवमानना हूँ ।
पूर्णता को चिर आकांक्षी कल्पना हूँ..........।
----------------- निशांत