Saturday, 24 November 2012

यादों की राख़


यादों की राख़  
                                                              कविता लिखने का शौक नहीं
कवितायें यूँ ही बन जाती हैं...
थोड़े आंसू पीकर तो देखो
रोने की आदत हो जाती है|

दिल के हँसने पर रोक नहीं
फिर रोने की धुन क्यों आती है?
हँसता रहता हूँ महफ़िल में
सूरत रोनी हो जाती है|..

मुझको रोता न देख सकोगे
पर आँखों में न अब पानी है,
दूर दूर तक देख लिया है
सारी दुनिया बचकानी है|

खुद को तो कुछ वो नहीं समझते
पर मुझको समझ सिखानी है,
उनको भी तो कुछ जीने दो
जिनकी खुद की वो कहानी है|


" अब जीवन के कुछ पन्नो को जलकर
यादों की राख बनानी है ,
दर्द घोलकर मय में साकी
सारी बोतल पी जानी है| "

------- निशांत

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