यादों की राख़
कविता लिखने का शौक नहीं
कवितायें यूँ ही बन जाती हैं...थोड़े आंसू पीकर तो देखो
रोने की आदत हो जाती है|
दिल के हँसने पर रोक नहीं
फिर रोने की धुन क्यों आती है?
हँसता रहता हूँ महफ़िल में
सूरत रोनी हो जाती है|..
मुझको रोता न देख सकोगे
पर आँखों में न अब पानी है,
दूर दूर तक देख लिया है
सारी दुनिया बचकानी है|
खुद को तो कुछ वो नहीं समझते
पर मुझको समझ सिखानी है,
उनको भी तो कुछ जीने दो
जिनकी खुद की वो कहानी है|
" अब जीवन के कुछ पन्नो को जलकर
यादों की राख बनानी है ,
दर्द घोलकर मय में साकी
सारी बोतल पी जानी है| "
------- निशांत
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