जिसकी गली में दिल तोड़कर फ़ेंक आये हैं,
जिसे छोड़कर, यादें दफना कर अभी आये हैं,
कसमें सुपुर्द-ए-आतिश कर दी जिसकी ,
उसके दर पर क्यों लिए जाते हो मुझे..?
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१. खुद को देखकर पहले से ही शर्मिंदा हूँ ,
आईनाखाने में क्यों लिए जाते हो मुझे...?
२. हर गुलशन में वो ही महकती है तो फिर
सैर-ए-बाग़ को क्यों लिए जाते हो मुझे ?
३. सबा बनके , गुलिस्ताँ बनके समाई वो मुझमे
फिर बेहिसाब क्यों किये जाते हो मुझे..?
४. मैकशी मुझ पर नहीं करती नशा , ए मैकश !
शराबखाना क्यों लिए जाते हो मुझे ?
५. अब नज़ारे देखने का म,उझे कोई शौक नहीं ,
चराग जलता हुआ क्यों दिए जाते हो मुझे ?
६. आवाज़-ए-तबला को मेरा ग़म छू न ले ,
महफिलों में क्यों लिए जाते हो मुझे ?
७.असलियत कुछ नहीं , सब कागज़ी है मेरे दिल ,
हसरतों में क्यों लिए जाते हो मुझे..?
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--- निशांत सिंह
ise maine 10-10-2011 ko likha.....
ReplyDeleteye wo rachna hai jiska mujhe khud bahut besabri se intezaar tha ..
bahut dino baad ek post di hai ...
sukoon hai ki achhi di hai...