Saturday, 24 November 2012

नया एक दौर

नया एक दौर

. मुश्किलों में फंसा जो पार क्या प़ा पायेगा ?
कंदराओं में जगत की नाम ही गम जाएगा ...

 जो हैं कहते सेवक स्वयं को इस धरा के पुत्रों का ,
समय आने पर स्वयं सच सामने आ जाएगा ...

 झंझावातों में लडखडाती एक नौका बावरी
कुछ दूर चलकर फिर संभालना उसको आ ही जाएगा ....

 मंतव्य मेरा क्या समझेंगे बेसुध निद्राशील जन
जीवन है छोटा, कुछ पलों में गंतव्य आ ही जाएगा.....


 शापित है संभव , दीर्घकाल से भव्य प्रेमात्मा प्रिये !
किन्तु कल्पित तरु जीवन मरू में उग ही जाएगा ...

 वाचकों की वाणी, धरम के गीत सच्चे अब कहाँ?
धीरज धरम सेवा समर्पण यूँ मान्य न हो पायेगा ....

 हिन्दू हैं हम , विश्वास है हमको होने का कल 'निशांत'
प्रयत्न करने पर नया एक दौर आ ही जाएगा....

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