Tuesday, 1 November 2011

आवाज़ नहीं मिलती


                                              ये  क्यों  नहीं  मिलते  ?
         

     कुछ फ़सानों पर दुनिया फ़िदा है ,
                   कुछ फ़सानों को आवाज़ नहीं मिलती ....

१. चाँद पर पहुंचे आसमाँ पर पहुंचे ,
                   ज़मीं पर अब भी आराम की जगह नहीं मिलती..

२. जवाब भी अब सब लोग हिसाब से देते हैं,
                   जुबाँ की आखिर दिल से क्यों नहीं पटती? 

३.जिसे दो जान की मरम्मत का जिम्मा ,
                   उसी के पैरों तले हैं लाशें क्यों बिछती?

४.तूफ़ान में शमा जलाने का है ख्व़ाब ,
                   अब तो बाजार में वो माचिस नहीं मिलती...

५. इजाज़त रौशनी फ़ैलाने की आफ़ताब को भी नहीं मिलती, 
                फ़क़त दस्तूर है - अँधेरे की चादर हमसे हटाये नहीं हटती  
६. वो कहते हैं कि वो सच्चे हैं,
                 हम क्या करे , उनके झूठ की हमें नब्ज़ नहीं मिलती ..

७. हम सच्चे हैं , तो परेशाँ हैं ,
                  और ख़ुशी उनकी छुपाये नहीं छुपती ......

८. उनको भी तो अब बदलना होगा ,
                 फरेब और झूठ का चोला फेंकना होगा ,
    जो छोड़ते नहीं नक़ाब-ए-मौकपरसती,
                  काँप जाती है रूह, उनको वज़ह-ए-मौत नहीं मिलती....
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                                   --- निशांत सिंह

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