मैंने पूछा जब ठिकाना नदी का
बोली मेरा भी कोई तराना है क्या?
किसको ताना दिया किसका मैंने बखान किया?
फिर भी पूछा -'उसकी ओर हो क्या?'
उसकी गली में बिताई हर शाम
दीवाना करके कहा 'दीवाने हो क्या?'
हद पूछ ली मेरे नसीब की जब कहा..
की मेरा भी कोई रक़ीब है क्या?
फ़साने बनाने को कब कोई इश्क हुआ...
नज़रें बोलें तो वही इश्क है क्या?
----------------------- निशान्त
वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा
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