खुदा जाने कि मेरे मर्ज़ किस वजह वाजिब हैं
सुकून-ए-ख़ुलूस की खातिर बस , तेरे कुचे में हाज़िर हैं..
शिकायतें किस कदर तेरी मुझसे कितनी बाकी हैं,
महफ़िल-ए-शिकवे की खातिर बस, तेरे कूचे में हाज़िर हैं...
" फ़ना होते हैं दीवाने हैं हमेशा किसी जालिम पर,
तेरे जुल्मों से ऊबे हैं, तेरे कूचे में हाज़िर हैं...."
----निशांत
WRITTEN ON 24-11-2011
ReplyDeletelast two lines my own favourite...