उरूज़-ए-उर्दू का नाम है ग़ज़ल ,
सनम की नज़ाक़त का ख्वाब है ग़ज़ल ,
महफिलों की जान है ये -
तड़पते दिल की आह है ग़ज़ल..|
लेकिन अब कहाँ वो लुत्फ़ ,
कहाँ वो नाज़नीनों की पहल;
शायरों से अब नहीं पटती ,
जिन की खातिर लिखते हैं ग़ज़ल...|
------------- निशान्त
सनम की नज़ाक़त का ख्वाब है ग़ज़ल ,
महफिलों की जान है ये -
तड़पते दिल की आह है ग़ज़ल..|
लेकिन अब कहाँ वो लुत्फ़ ,
कहाँ वो नाज़नीनों की पहल;
शायरों से अब नहीं पटती ,
जिन की खातिर लिखते हैं ग़ज़ल...|
------------- निशान्त
meri baawanaaon ko samjho..
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