Monday, 16 January 2012

तन्हा कोशिश


                                          तन्हा कोशिश
  ज़िन्दगी रही थी बीत जाने किस फ़िराक में
            मुद्दतों बाद आशिकी  फिर से जवान  हैं..|

 समाँ है बदल रहा , मौसम भी बदल  रहे;
           क्या नशा है मौजूद ,क्या साकी के ख्वाब हैं!

मौजों में क्या बाकी नहीं थोड़े भी हसीं सितम
          दर्द भरे साहिल को कितना इनका इंतज़ार है...|

फूल खिल जाते हैं सुना अब बंजर ख्यालों से 
         महफ़िल-ए-ग़ज़ल की कैसी बदनामियाँ ये हैं!

 जरूरी है बस मशगूल रहना 'निशांत'
         ऊब से बचने की कैसी तन्हा कोशिशें ये  हैं....|

                                             --------------------- निशांत 

5 comments:

  1. ONE OF MY VERY FAVOURITE 4 VERY SPECIAL REASONS..

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  2. ज़िन्दगी रही थी बीत जाने किस फ़िराक में
    मुद्दतों बाद आशिकी फिर से जवाँ हैं..

    Khoob Kaha...Bahut Sunder

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  3. वाह ! बेहद खूबसूरती से कोमल भावनाओं को संजोया इस प्रस्तुति में आपने ...

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  4. dhanyawaad sanjay ji ...bas aap logo ki beshkeemati taareefo ke liye aur achha likhta rahoonga...

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